Nirukta and Nighantu




निरुक्त और निघण्टु



Nirukta and Nighantu


निरुक्त 


* निरुक्त और वैदिक साहित्य 6 वेदांग आदि पर संक्षेप में वर्णन हो चुका है अगर न देखा हो तो यहाँ देखले 👉  वैदिक साहित्य

* निरुक्त को आसान शब्दो मे समझने का प्रयत्न  करते है , आज का विषय व्याकरण , निरुक्त और निघण्टु का संक्षेप में परिचय ।


व्याकरण क्या है ?


* वैदिक साहित्य में आनेवाले शब्दो का निर्माण , उनकी शुद्धता आदि अध्ययन प्रकृति और प्रत्यय के संबंध द्वारा व्याकरण ही करता है । 

* व्याकरण का निर्देश तो ऋग्वेद काल से ही मिलने लगता है परंतु तैत्तरीय संहिता  ( 6 - 4 -7 -3 ) में व्याकरण की उत्पत्ति की कथा दी हुई है । 

* इन्द्र के द्वारा वाणी व्याकृत हुई इन्द्र ही आदि वैयाकरण है व्याकरण के कई परिभाषित शब्द हमे 
गोपथ - ब्रह्मण ( 1 - 24 ) में भी मिलते है ।

* इस प्रकार से छिटपुट व्याकरण यास्क के निरुक्त काल तक लिखे गए है । व्याकरण का 1 परिपूर्ण आचार्य पाणिनि ने ही 10 प्रचीन आचार्य के नाम गिनाये है जिसमे से यास्क से भी प्रचीन है ।
( नोट : - परंतु इसका कोई प्रमाण इतिहासिक नही उपलब्ध है  ।  ) 

* पाणिनी समय काल ( 500 ईसवी पूर्व का है ) उसमें अपनी अष्टध्य्यायी के द्वारा तत्कालीन भाषा को संयत किया । स्थान - स्थान पर वैदिक व्याकरण के विषय मे भी संकेत किये है परंतु वे संकेतमात्र ही है ।

* वस्तुतः वैदिक भाषा का सर्वगीणर व्याकरण अभीतक उपलब्ध नही है । पाणिनी के अलावा दूसरे वैयाकरण हुई है ।

* किंतु इनके नियमो से आगे बढ़कर लिखने वाला कोई नही है । पाणिनी = अष्टध्य्ययी , कात्यायन = वार्तिक 
और पतंज्जिल = महाभाष्य इन तीनो को त्रिमुनी व्याकरण कहते है  और उन आचार्यों की प्रामाणिकता भी अधिक है । इन्हें ही लेकर काशीक , कौमुदी आदि पीछे ग्रन्थ लिखे गए है ।


निरुक्त क्या है ?


* वेदांगों में 4 स्थान पाने पर निरुक्त अपनी कई विशेषताये रखता है । इसमे मुख्यतया वैदिक शब्दों के अर्थ जानने की प्रक्रिया बतलाई जाती है ।

* जैसे कि सायण ने अपनी ऋग्वेददादि भाष्यभूमिका में किया है , की " अर्थ ज्ञान के लिए स्वतंत्र रूप से जहाँ पदों का समूह कहा गया है वही निरुक्त है ।

* निरुक्त स्वयं निघण्टु नामक वैदिक कोष का भाष्य है तथा यास्क का लिखा हुआ है । 

* निघण्टु में केवल शब्द गिना दिए है जो प्रायः अमर कोष की शैली में इन्ही शब्दो पर यास्क ने अपना विशेष ध्यान रखा है और उनके अर्थों तक पहुंचने की चेष्टा की है । 

* निघण्टु के 5 अध्य्यो की व्याख्या महर्षि यास्क ने 12 अध्य्यायो में कई है तथा पीछे 2 अध्य्या परिशिष्ट के रूप में जोड़े गए हैं । वेदाङ्ग जिस प्रकार वैदिक शाखा 
पृथक पृथक है उसी प्रकार यह अनुमान किया गया है कि निरुक्त भी अलग अलग है । 


निघण्टु और निरुक्त में क्या अंतर है ?


* यास्क ने निघण्टु में गिनाये गए है वैदिक शब्दो की व्याख्या की है इस दृष्टि से निघण्टु का बहुत महत्व है ।

* निघण्टु ( वैदिक शब्द कोश ) जिस निघण्टु पर महर्षि यास्क ने भाष्य की रचना की है उसी 5 अध्य्यायो में बटा है ।

* इनके शब्दो की व्याख्या यास्क ने निरुक्त के 2 एंवम 3 अध्य्यायो में कई है । निघण्टु के इन अध्य्यायो मे 1340 शब्द है जिनमे केवल 230 शब्दो की ही व्याख्या यास्क ने की है  ।

* इन 1340 शब्दों में पयार्यवाचि शब्द संगृहीत है  ।
उदाहरण ० पृथ्वी के 21 पर्याय शब्द , 11 जलना यार्थ वाली क्रिया , 12 बहुत के पर्य्या आदि ।

* जहाँ जहाँ निरुक्त की पांडुलिपि या मिली है , वहा वहाँ निघण्टु भी साथ साथ ही मिला है , इसके अलावा 
स्कंद महेश्वर , दुर्ग आदि निरुक्त के टिकाकार निरुक्त के प्रथम अध्य्या को 6 अध्य्या मानकर व्याख्या करते है ।
इन तर्को से निघण्टु तथा निरुक्त एक ही ग्रन्थ था यास्क प्रणीत मालूम पड़ते है ।

* निरुक्त के आरंभ में " समामनायः समामनायः "
मानो एक ही ग्रन्थ में कोई नया अध्य्याय शुरू कर राह है । प्राचीन परम्परा के अनुसार निरुक्त का आरंभ 
" अथ " से होना चाहिए था  । अतः निघण्टु और निरुक्त एक ही ग्रन्थ है ।


Nirukta and Nighantu


* और नई  तथ्यो के साथ मिलते है ।


धन्यवाद

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